Wednesday, October 7, 2009

2.
मेरा कॉलेज, दुनिया का सबसे बर्वाद कॉलेज था, आज भी उम पलों को याद करती हु तो मन दुःख से भर जाता है पर इस कॉलेज पहला दिन अजीब सा था, रैगिंग के नाम पर seniors आये और शायद वो भी(सर नीचे था तो देख नही पाई ) लेकिन बिलकुल शांति से मेरा नाम पूछा गया. बस रैगिंग यही तक सीमित रही और सीनियर से contact भी. इसीलिए शायद मेरे लिए कॉलेज गन्दा लगता है की उसने मुझे आशीष से मिलने के ज्यादा मौके नही दिए.
         अगले दिन वो उस बस स्टाप पे नही था, बाद में पता चला वो localized नहीं है, रूम ले के रह रहा है, और कही और शिफ्ट हो गया है.
कुछ दिन बाद फ्रेशेर्स पार्टी थी. वो मुझे फिर दिखा, लेकिन स्टेज पर, डांस करते हुए. डांसर तो मैं भी थी, उससे कुछ कम नही और मैंने भी डांस किया..........शायद सबसे ज्यादा तालियाँ और appreciation  मुझे ही मिला था, लेकिन ख़ुशी तरब हुई जब उसने आकर मुझसे कहा-
        'व्हाट्स यौर नेम ?'
        'प्रियंका'
        'nice dance'
        'thanks'
बस इतनी सी थी हमारी ये दूसरी मुलाकात. लेकिन इसी मुलाकात ने मुझे एक अद्भुत मौका दिया, उसके साथ डांस करने का.

वो हमसफ़र

1.
कहानियां बनाई नही जाती, अपने आप बन जाती हैं, शायद हर एक के दिल में एक अनकही कहानी है, बिन टटोली गई दास्ताँ......मेरे दिल में भी है, लेकिन मेरी नहीं. एक एसे इंसान की जिसे पता भी नहीं है की मैं उसके बारे मैं लिख रही हूँ. वो इंसान जो मेरी ज़िन्दगी में कब आया और कब चला गया पता ही न चला. मैं तो इस कहानी का साइड किरदार हूँ, मुख्य तो वही, मेरा आशीष, सपनो का आशीष, जिसे मिलने मैं ही एक अरसा गुज़र गया और शायद कहने में साड़ी उम्र गुज़र जायेगी.
           आशीष, उससे मिलने का मुझे मौका ही कब मिला, और जो मिला भी, मुझे कम ही लगा.
   बात वर्षों पुरानी है, वर्षो मतलब कुल मिला के ५-६ वर्ष लेकिन शायद सदियों से लगते हैं. उसके बिन हर एक पल ही एक सदी के बराबर है. हाँ, तो वह मुझे मिला बस स्टाप पर, इंतज़ार करते हुए, मेरा नही अपनी बस कॉलेज बस का. आज सोचती हूँ काश वो मेरा इतजार कर रहा होता. वो अक्टूबर था, सर्द महिना, लेकिन बदल अपने करतब दिखा रहे थे, बिन मौसम बरसात ने हमारे तन-मन को सरोवर कर दिया था. हम दोनों ही बस का 'वेट' कर रहे थे, मैं अपनी और वो अपनी, लेकिन बस आई तो साथ- साथ ही बैठे......वही पता चला की वह मेरा सीनियर है. बस एक साल.
तो ये थी हमारी पहली मुलाक़ात, जिसमे ना तो मैंने कुछ बोला न उसने.......बिलकुल चुपचाप सी,किन्तु बारिश की तरह उसके  पहले एहसास से ही मेरा दिल भी सरोवर हो चुका था. और वो मेरी अँधेरी रातो को ख्वावो के ज़रिये उजाले से भरने लगा था.