Wednesday, October 7, 2009

वो हमसफ़र

1.
कहानियां बनाई नही जाती, अपने आप बन जाती हैं, शायद हर एक के दिल में एक अनकही कहानी है, बिन टटोली गई दास्ताँ......मेरे दिल में भी है, लेकिन मेरी नहीं. एक एसे इंसान की जिसे पता भी नहीं है की मैं उसके बारे मैं लिख रही हूँ. वो इंसान जो मेरी ज़िन्दगी में कब आया और कब चला गया पता ही न चला. मैं तो इस कहानी का साइड किरदार हूँ, मुख्य तो वही, मेरा आशीष, सपनो का आशीष, जिसे मिलने मैं ही एक अरसा गुज़र गया और शायद कहने में साड़ी उम्र गुज़र जायेगी.
           आशीष, उससे मिलने का मुझे मौका ही कब मिला, और जो मिला भी, मुझे कम ही लगा.
   बात वर्षों पुरानी है, वर्षो मतलब कुल मिला के ५-६ वर्ष लेकिन शायद सदियों से लगते हैं. उसके बिन हर एक पल ही एक सदी के बराबर है. हाँ, तो वह मुझे मिला बस स्टाप पर, इंतज़ार करते हुए, मेरा नही अपनी बस कॉलेज बस का. आज सोचती हूँ काश वो मेरा इतजार कर रहा होता. वो अक्टूबर था, सर्द महिना, लेकिन बदल अपने करतब दिखा रहे थे, बिन मौसम बरसात ने हमारे तन-मन को सरोवर कर दिया था. हम दोनों ही बस का 'वेट' कर रहे थे, मैं अपनी और वो अपनी, लेकिन बस आई तो साथ- साथ ही बैठे......वही पता चला की वह मेरा सीनियर है. बस एक साल.
तो ये थी हमारी पहली मुलाक़ात, जिसमे ना तो मैंने कुछ बोला न उसने.......बिलकुल चुपचाप सी,किन्तु बारिश की तरह उसके  पहले एहसास से ही मेरा दिल भी सरोवर हो चुका था. और वो मेरी अँधेरी रातो को ख्वावो के ज़रिये उजाले से भरने लगा था.

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